कक्षा सातवीं पाठ 1(हम पंछी उन्मुक्त गगन के)
प्रकरण- (पाठ का नाम)
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
कवि का नाम-
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
(1)
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाएँगे।
हम बहता जल पीने वाले
मर जाएँगे भूखे-प्यासे,
कहीं बली है कटुक निबौरी
कनक-कटोरी की मैदा से।
पंछी- चिड़िया। । उन्मुक्त- आज़ाद, खुला। गगल-आकाश,
आसमान। पिंजर बद्ध- पिंजरे में बंद। कनक-स्वर्ण/सोने की। तीलियाँ-
सलाखें। पुलकित- कोमल, प्रसन्न चित्त। कटुक- कड़वी। निबौरी-
नाम का फल।
सरलार्थ- इन पंक्तियों में पिंजरे में बंद पक्षियों
का कहना है कि हम खुले आसमान में विचरण करने वाले हैं। हम पिंजरे में बंद होकर
नहीं रह सकते। यदि हमें पिंजरे में बंद कर दिया गया तो हम अपनी खुशी के गीत नहीं
गा पाएँगे। हम आसमान में उड़ने वाले पक्षी पिंजरे में बंद होकर कभी भी खुशी के गीत
नहीं गा पाएँगे। यह पिंजरा चाहे सोने का ही कोयों न हो। सोने के पिंजरे की तीलियों
से टकरा कर हमारे कोमल पंख टूट जाएँगे। पिजरे में बंद पक्षी को कोई सुख का अनुभव
नहीं हो सकता। हमारे लिए स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण है। पक्षी यह जानते हैं कि वे
नदियों और झरनों का बहता जल पीने वाले है। सोने के पिंजरे में उन्हें खान-पानी
अच्छा नहीं लगेगा और वे भूखे-प्यासे मर जाएँगे। उन्हें तो स्वतंत्र रहकर कड़वी
निबौरी ही खाना पसंद है। गुलामी में मिली सोने की कटोरी का मैदा उन्हों कभी पसंद
नहीं आएगा क्योंकि उन्हें आज़ादी पसंद है। पक्षी हर हालत में स्वतंत्र रहना चाहती
है।
प्रश्न-1. कवि एवं कविता का नाम लिखिए।
प्रश्न-2. इस काव्यांश में पक्षी अपनी क्या इच्छा प्रकट
करती है?
प्रश्न-3. पक्षी
कैसे रहना पसंद करते है?
प्रश्न-4. पक्षियों के पंख कब टूट जाते हैं?
प्रश्न-5. पक्षियों को कड़वी निबौरी क्यों पसंद है?
(2)
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति उड़ान सब भूले,
बस सपनों में देख रहे हैं
तरु की फुनगी पर के झूले।
ऐसे थे अरमान की उड़ते
नीले नभ की सीमा पाने,
लाल किरण-सी चोंच खओल
चुगते तारक- अनार के दाने।
स्वर्ण-श्रृंखला—सोने की
सलाखों से निर्मित पिंजरा। बंधन-
परतंत्रता,बाँधना। तरु- पेड़। फुनगी- पेड़ की सबसे ऊँची टहनी का सिरा, चोटी। उड़ान- उड़ने की कला, उड़ने की प्रक्रिया। अरमान-इच्छा, ख्वाहिश। नभ-आकाश।
तारक-तारे। सीमा-
अंतिम छोर,हद। अनार- एक फल का नाम। चुगना- दाना चोंच में उठाकर खाना।
सरलार्थ- इन पंक्तियों के माध्यम से पक्षी अपनी
भावना व्यक्त करते हुए कह रहे हैं कि सोने
के पिंजरे में कैद होकर अपनी गति और उड़ने की कला सब भूल गए हैं। अब वह सपनों में
ही सोंचते हैं कि वह पेड़ की सबसे ऊँची चोटी पर झूला झूल रहे हैं। उनकी इच्छी थी
कि वे कभी उड़ते-उड़ते आसमान के उस छोर तक पहुँच जाएँ, जहाँ उसका अंतिम छोर है।
पक्षियों की यह भी इच्छा थी कि किरणों जैसी अपनी लाल चोंच से तारों जैसे अनार के
दाने चुगेंगे। यह इच्छा तभी पूरी हो सकती है जब उन्हें उड़ने की पूरी आजादी मिले।
प्रश्न-1. पक्षी कब अपनी स्वाभाविक उड़ान भूल
जाते हैं?
प्रश्न-2. पक्षी
किस झूले की बात करते हैँ?
प्रश्न-3. किसके क्या अरमान थे?
प्रश्न-4. चोंच किसके समान बताए गए हैँ?
प्रश्न-5. पक्षी क्या चुगना चाहते हैं?
(3)
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो,
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो।
शब्दार्थ-
सीमाहीन- जिसका कोई
सीमा न हो। क्षितिज- जहाँ धरती और आकाश मिलते
प्रतीत हों,(आकाश)। नीड़- घोंसला,खोंता। आश्रय- सहारा। छिन्न-भिन्न—तोड़-फोड़।
आकुल-बेचैन। विघ्न-रुकावट,भाधा।
छिन्न- नष्ट-भ्रष्ट। आकुल
उड़ान- उड़ने की अधीरता। विघ्न- बाधा।
सरलार्थ- इन पंक्तियों के माध्यम से पक्षियों का
कहना है कि आसमान की ऊँचाइयों को छूने के लिए उनके पंखों से इसप्रकार होड़ लग जाती
है कि उड़ते-उड़ते या तो वे क्षितिज पा जाते या अपने प्राण गँवा देते। यानी पक्षी
उस स्थान पर पहुँचना चाहते हैं जहाँ धरती आकाश से मिलती हुई प्रतीत होती है।
पक्षियों द्वारा व्यक्त इस इच्छा से पता चलता है कि उन्हें अपनी आज़ादी कितनी
प्रिय है। पक्षी पुनः आग्रह करते हुए कहते हैं कि हे मनुष्यों! हमें भले ही
घोंसला मत दो और बेशक पेड़ की डाली का आश्रय भी न
दो, लेकिन जब ईश्वर ने हमें उड़ने के लिए पंख दिए हैं तो हमें पिंजरे का
कैदी बनाकर हमारी स्वतंत्र उड़ानों में बाधा मत डालो। हमें पिंजरे में रहना पसंद
नहीं है। हमें तो उड़ान भरना ही पसंद है।
प्रश्न-1. पक्षी किससे होड़ा-होड़ी करना चाहते
हैं ?
प्रश्न-2. पक्षी क्या नहीं चाहते?
प्रश्न-3. पक्षियों को क्या पसंद नहीं है?
प्रश्न-4. पक्षी अपने उड़ने के अधिकार को बचाने
के लिए क्या-क्या देने को तैयार हैं?
प्रश्न-5. काव्यांश से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
पाठ्य पुस्तक
के प्रश्न
प्रश्न-3
भाव स्पष्ट कीजिए-
या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती साँसों की
डोरी।
उत्तर- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक
वसंत भाग-2 की कविता ‘हम
पंछी उन्मुक्त गगन के’ नामक
पाठ से ली गई है। इस कविता के रचयिता
प्रसिद्ध कवि श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ हैं। इस पंक्ति में कवि पक्षी के माध्यम से कहना
चाहते हैं कि पक्षी स्वतंत्र रहकर क्षितिज की सीमा तक उड़ जाने की अपनी इच्छा
व्यक्त करते हैं कि उड़ते-उड़ते या तो वह क्षितिज की सीमा ढूँढ़ ही निकालेंगे या
प्राण त्याग देंगे। पक्षियों के इस कथन से उनकी उन्मुक्त उड़ने के प्रति
ललक(इच्छा) व्यक्त हुई है।
प्रश्न-4. कई लोग पक्षी पालते हैं-
(क)
पक्षियों को पालना उचित है अथवा नहीं? अपने विचार
लिखिए।
(ख) क्या
आपने या आपकी जानकारी में किसी ने कभी कोई पक्षी पाला है? उसकी देखरेख
किस प्रकार की जाती होगी, लिखिए।
भाषा की बात (व्याकरण)
विशेषण
परिभाषा- संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने
वाले शब्दों को ‘विशेषण’ कहते हैं।
जैसे- लाल, पीला, अच्छा, बुरा, सुन्दर खट्टा,
मीठा, लम्बा, चौड़ा आदि।
विशेषण के भेद-
विशेषण के चार भेद हैं।
(क)
गुणवाचक विशेषण
(ख) संख्यावाचक
विशेषण
(ग)
परिमाणवाचक विशेषण
(घ)
सार्वनामिक या संकेतवाचक विशेषण
· गुणवाचक
विशएषण-जिस विशेषण से संज्ञा या सर्वनाम के गुण, दोष, रंग या आकार आदि का बोध हो
उसे ‘गुणवाचक
विशेषण’ कहते
हैं। जैसे- मीछा, अच्छा, सुन्दर,चतुर, कोमल, महान आदि।
· संख्यावाचक
विशेषण- जिस विशेषण से संख्या का पता चले उसे ‘संख्यावचक विशेषण’ कहते हैं। जैसे- चार, पाँच, दस, बीस,
सौ, हज़ार, दो हज़ार आदि।
· परिमाणवाचक
विशेषण- जो विशेषण अपने विशेष्य की मात्रा या परिमाण के विषय में जानकारी देते हैं
उसे ‘परिमाण
वाचक’
विशेषण कहते हैं। जैसे- थोड़ा, बहुत, अधिक, ज़्यादा, चार लीटर, पाँच किलो, दस
मीटर, बीस गज, एकड़ आदि।
· सार्वनामिक
विशेषण- जो सर्वनाम शब्द संज्ञा से पहले आकर उनकी ओर संकेत करते हैं, उन्हें ‘संकेतवाचक या
सार्वनामिक विशेषण’ कहते
हैं। जैसे- यह पंखा नया है। वह लड़का जाता है। मेरी घड़ी
नयी है। वे लोग ईमानदार हैं। मेरा
भाई कोलकाता में रहता है। रंगीन सभी शब्द संकेतवाचक विशेषण हैं।
(आप
भी विशेषण के चारों भेदों के पाँच-पाँच उदाहरण लिखिए)
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