कक्षा दसवीं पाठ 1 (सूरदास के पद)
सूरदास के पद
कवि
का
नाम- सूरदास
पद-
पद काव्य रचना की गेय शैली है। इसका विकास लोकगीतों की परंपरा से माना जाता
है। यह मात्रिक छन्द की श्रेणी में आता है। प्राय: पदों के साथ किसी न किसी राग का
निर्देश मिलता है। पद विशेष को सम्बन्धित राग में ही गाया जाता है।
"टेक" इसका विशेष अंग है। हिन्दी साहित्य में पद शैली की दो परम्पराएँ
मिलती हैं। एक सन्तों के "सबदों" की दूसरी कृष्णभक्तों की पद-शैली है, जिसका
आधार लोकगीतों की शैली होगा।
पाठ परिचय
जीवन परिचय- भक्तिकाल के सगुण
भक्ति धारा कृष्ण भक्त कवियों के सिरमौर के रूप में जाने एवं माने जाने वाले कवि सूरदास के जीवन परिचय के बारे में साहित्यकार एकमत नहीं हैं। ऐसा माना जाता है कि इनका जन्म आगरा और मथुरा के बीच कनकता नामक स्थान पर हुआ था। इस कवि ने अपने विषय में कहीं कुछ स्पष्ट रूप से नहीं लिखा है। ऐसा माना जाता है कि सूरदास जन्मांध थे, किन्तु कृष्ण के बाल सौंदर्य का जैसा चित्र इस कवि ने अपनी लेखनी से उकेरा है, उसे देखकर इस पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। इनके गुरु बल्लभाचार्य थे, जिनके आदेश पर इन्होंने श्रीनाथ मंदिर में कृष्ण- लीला के पदों की रचना की। वे यहीं आजीवन कृष्ण भक्ति के पदों को गाते रहे। इनकी मृत्यु सन 1583 में परसोली नामक स्थान पर हुई।
रचनाएँ -
सूरदास द्वारा रचित तीन ग्रंथ सूर
सागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी प्रसिद्ध
हैं। इनमें सूरसागर सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध
है। कहा जाता है कि सूरसागर में सवा लाख पद हैं
किंतु अब तक लगभग 5000 पद ही प्राप्त हो
सके हैं। सूरसारावली में 1107 पद हैं जो होली
गीत के रूप में हैं। इसमें एक ही छंद का प्रयोग
हुआ है। साहित्य लहरी में पदों की संख्या 118 है।
साहित्यिक विशेषताएँ
– सूरदास को वात्सल्य, प्रेम और
सौंदर्य का अमर कवि कहा जाता
है। सूरदास ने बालक कृष्ण के
सौंदर्य का जैसा सजीव वर्णन
किया है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।
उनके काव्य के विषय और
आत्म
निवेदन (भक्ति पदों में), बाल
-वर्णन, गोपी- कला तथा गोपियों
का विरह वर्णन आदि है।
पहला पद
ऊधौ, तुम हौं अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन
अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न
दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न
ताकौ लागी।
प्रीति-नदी मैं पाऊँ न बोरयौ, दृष्टि
न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भओरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।
शबदार्थ-
बड़भागी- भाग्यवान, सौभाग्यशाली। अपरस-
अछूता, अलिप्त, नीरस। तगा- बंधन, धागा। अनुरागी- प्रेम में लिप्त। परइनि
पात- कमल पत्र, कमल का पत्ता। ता रस- उसके रस से। देह-
शरीर। दागी- दागदार, धब्बा। ताकौ- उसको। प्रीति-नदी—प्रेम
रूपी नदी। पाऊँ-पैर। बोर्
यो – डुबोया। परागी- मुग्ध होना। अबला- कमजोर, स्त्री। भोरी-
भोली-भाली। गुर- गुड़। चाँटी-
चींटी। ज्यौं-जैसे। पागी-
चिपटी हुई।
सरलार्थ- उद्धव
के मुँह से प्रेम संदेशों की जगह योग साधना का संदेश सुनकर गजियों को आश्चर्य होता
है। वे व्यंग्योक्ति करती हुई उद्धव से कहती है कि हे उद्धव! तुम तो
अत्यन्त भाग्यशाली हो। पर हे उद्धव तुम कैसे भाग्शाली हो जो श्री कृष्ण के अत्यन्त निकट रहकर भी उनके
प्रेम से अछूते रह गए और उनके प्रेम बंधन में नहीं बँध सके। तुम्हारे मन में कृष्ण
के प्रति अनुराग पैदा ही नहीं हो सका। तुम्हारी स्थिति तो कमल के पत्ते और तेल लगी
उस गागर का समान है जो पानी में डूबकर भी पानी से अछूती रहती है और पानी उसे गीला
नहीं कर पाता है। कुछ ऐसी दशा तुम्हारी भी है जो कृष्ण प्रेम का अंश मात्र भी
तुम्हें प्रेममय न बना सका। उद्धव, तुमने आजतक प्रेम रूपी नदी में पैर नहीं डुबोया
है, जो प्रेम की महत्ता समझ सके और नहीं किसी के रूप सौंदर्य पर तुम मुग्ध ही हुए।
तुम्हारी दृष्टि श्री कृष्ण के रूप सौंदर्य से अप्रभावित रही। कवि सूरदास के
माध्यम से गोपियाँ कहती है कि एक हम भोली-भाली गोपियाँ हैं जो श्री कृष्ण के प्रेम
में इस तरह अनुरक्त हो गई है कि हमारी स्थिति गुड़ से चिपटी चीटियों जैसी हो गई
है। अब हमें कोई जबरदस्ती अलग भी करना चाहे तो हम टूट तो सकती हैं पर श्री कृष्ण
के प्रेम को छोड़ नहीं सकती हैं।
प्रश्न-1. गपियों ने क्या कहकर उद्धव
पर व्यंग्य किया है? और क्यों?
प्रश्न-2.
गोपियों ने उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की है और क्यों?
प्रश्न-3.
गोपियों ने अपनी तुलना गुड़ से चिपटी चींटियों से क्यों की है?
दूसरा पद
मन की मन ही
माँझ रही।
कहिए जाइ
कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार
आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग
सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं
गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।
शब्दार्थ- माँझ-
मध्य, बीच में। अवधि- समय सीमा। अधार- सहारा। आस-
आशा। आवन की- आने की। बिथा- व्यथा। सही-
सह लिया। जोग-योग। बिरहिनि- बीरहनियों की,(जो किसी से बिछुड़ जाते
हैं)। बिरह- वियोग। दही-
दहक उठी, जल उठी। गुहारि- मदद के लिए
पुकार। जितहिं तैं-
जहाँ से। उत तैं- उधर से। धार- योग का प्रबल धारा। धीर- धैर्य। धरहिं-धारण
करें। मरजादा-मर्यादा। न लही- नहीं रखी।
सरलार्थ- श्री कृष्ण के मथुरा चले
जाने के बाद गोपियाँ श्रीकृष्ण के वियोग में दुखी थीं। वे प्रेम संदेशों और श्रीकृष्ण के आने का आधार बनाकर दिन बिता
रही थीं कि तभी श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए उद्धव योग साधना का संदेश लेकर उनके पास
आ जाते हैं। उनकी बात सुनकर गोपियों ने कहा कि हे उद्धव! हमारे मन की बात हमारे मन में ही रह गई। हम अपनी
पीड़ा और बिरह-व्यथा किससे जाकर कहें। इसे हम अपनी बिरह- व्यथा हर एक के सामने
प्रकट भी तो नहीं कर सकती हैं। कृष्ण कुछ समय बाद मथुरा से लौट आएँगे, उसे आधार
बनाकर हम गोपियाँ दिन बिता रही थीं और तन- मन की पीड़ा सह रही थीं, पर हे उद्धव! तुम्हारे योग संदेशों को सुन-सुनकर हमारी
बिरह-व्यथा दहक उठी है। इस पीड़ा से मुक्ति पाने का साधन हम जहाँ से चाहते थे,
वहीं से अब योग की प्रबल धारा बहने लगी है। अर्थात कृष्ण ही हमारी व्यथा का निवारण
कर सकते थे लेकिन अब वहीं से यह योग साधना का संदेश आया है। गोपियाँ कृष्ण के ऐसे
व्यवहार से दुखी होकर कहती है कि हे उद्धव! जिस कृष्ण के कारण हमने सारी मर्यादाएँ भंग कर दी थी, उन्होंने प्रेम के बदले प्रेम प्रतिदान न करके
मर्यादा का पालन नहीं किया। ऐसे में हम गोपियाँ किस तरह धैर्य धारण कर सकती हैं।
तीसरा पद
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम वचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़
करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि,
कान्ह-कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करूई
ककरी।
सु तो ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी
न करी।
यह तो ‘सूर’ तिनही लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।।
शब्दार्थ- हरि-
कृष्ण। हारिल- एक पक्षी जो अपने पैरों में
लकड़ी दबाए रहता है। लकरी- लकड़ी। क्रम- कर्म। वचन-वाणी।
उर- हृदय (दिल)। पकरी-
पकड़ रखा है। सोवत-सोते
समय। दिवस-दिन। निसि-रात। जकरी- रटती रहती
है। करूई- कड़वी, तिखी। सु तौ- वही। ब्याधि-
रोग, बीमारी। तिनहिं- उन्हें ही। सौंपौ- दे देना। चकरी-
चक्र के समान अस्थिर।
सरतार्थ- गोपियाँ श्रकृष्ण के प्रति
अपने एकनिष्ठ प्रेम की अभिव्यक्ति करती हुई कहती है कि हे उद्धव! हमारे कृष्ण हारिल की लकड़ी के समान हैं। जिस
प्रकार हारिल पक्षी अपने पंजों में दबी लकड़ी को आधार बनाकर उड़ता रहता है उसी
प्रकार हमारे जीवन के लिए कृष्ण आधार हैं। हम गोपियाँ मन, वाणी और कर्म से अपने मन
में श्रीकृष्ण को बसाए हुए हैं और हर समय कृष्ण की रट लगाए रहती हैं। हे उद्धव!
तुम्हारी योग की बातें सुनकर ऐसा लगता है जैसे हमने कड़वी ककड़ी खा ली है।
इस योग रूपी कड़वी ककड़ी को निगलना हमारे
वश की बात नहीं है। उद्धव योग का ऱूप हम
गोपियों के लिए रोग के समान है जिसके बारे में न महने कभी सुना है, न देखा
है और न कभी किया है। अन्त में वे फिर उद्धव से कहती है कि योग -साधना का संदेश
उनके लिए उचित रहता है जिनका मन चकरी के समान अस्थिर अर्थात चंचल रहता है। हमारे
मन तो पहले से ही कृष्ण के प्रति जुड़ा हुआ है। अतः हमें योग शिक्षा की कोई
आवश्यकता नहीं है।
प्रश्न-
2. गोपियाँ दिन-रात किस बात की रट लगाए रहती है?
3. ‘नंद-नंदन’ विशेषण किसके लिए प्रयुक्त
हुआ है?
4. गपियों
को योग साधना कैसी लगती है?
5. गोपियों
ने योग-साधना का उपदेश किन्हें देन के लिए कहा है?
6. प्रस्तुत
पद से उत्प्रेक्ष अलंकार का उदाहरण लिखिए।
7. ‘हारिल की लकरी’ का अभिप्राय स्पष्ट करते हुए बताइए कि गोपियों ने ऐस क्यों कहा होग?
8. गोपियाँ योग संदेश को अपनाने के लिए क्यों
तैयार नहीं है
?
चौथा पद
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ
पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग संदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपने मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यों अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तो यहै ‘सूर’, जो प्रजा न
जाहिं सताए।।
शब्दार्थ- हरि- श्रीकृष्ण। मधुकर- भौंरा, उद्धव
को संबोधन)। हुते-थे। पठाए- भेज दिए। पर हित- दूसरों की भलाई। धाए- धौड़ते आते थे।
फेर- वापस। पाइहैं- पा लेंगे। और-दूसरों की। अलीति- अन्याय। छुड़ाए- बंद करा दिए।
सरलार्थ- उद्धव के ज्ञान मार्ग की बातों को सुनकर
गोपियाँ परस्पर बातें करती हुई उद्धव को ताना मारती है। कोई गोपी कहती है कि सुना
है कि कृष्ण ने अब राजनीति सीख ली है। इपने यह बात समझ ती है जो इस मधुकर अर्थात
उद्धव ने कही है? हमें
श्रीकृष्ण से संबंधित सभी समचार मिल गए हैं। अर्थात उद्धव के ज्ञान मार्ग के उपदेश
से हमें यह अनुमान लग जाना चाहिए किश्
श्रीकृष्ण किस प्रकार की बातें करने लगे हैं। एक तो वे पहले से ही बहुत चतुर थे,
अब प्रेम करके उन्होंने अपनी चतुरता दिखा दी है। उनकी बुद्धि का पता तो तभी चल गया
था जब उन्होंने युवतियों अर्थात स्त्रियों को योग-साधना का उपदेश देने के लिए
उद्धव को यहाँ भेजा। हे उद्धव! पहले के लोग बड़े भले होते थे जो
दूसरों के हित के लिए दौड़ते-फिरते थे। पर
अब हम एक प्रार्थना करती हैं कि श्रीकृष्ण हमें हमारे वे मन लौटा दें जो
उन्होंने मथुरा जाते समय चुरा लिया थे।
भाव यह है कि श्रीकृष्ण ने हमारे मन को चुरा लिया है, पहले उस मन को वापस
लौटाएँ तब योग-साधना का उपदेश दें। हमें इस बात पर आश्चर्य है कि जो दूसरों की सभी नीतियाँ छुड़ाए बैठे
हैं, वे अपनी नीति कैसे चला रहे हैं। यह तो अन्याय है। सूरदास कहते हैं कि गोपियाँ
कह रही हैं कि राजधर्म तो यह है कि राजा
प्रजा को न सताए। अर्थात श्रीकृष्ण हमें इस तरह दुखी करके और सता कर (तड़पाकर) राज
धर्म का पालन नहीं कर रहे हैं।
प्रश्न-1. अति लघुतरीय प्रश्न
(क) गोपियाँ किसे ताना मार रही हैं?
(ख) गोपियाँ
कृष्ण को राजनीति सीखने का उपालंभ क्यों देती है?
(ग) गोपियाँ
उद्धव से पहले के लोगों के विषय में क्या कहती हैं?
(घ) गोपियाँ
राज धर्म के बारे में क्या कहती हैं?
(ङ) ‘मधुकर’ शब्द का क्या
अर्थ है यह किसके लिए प्रयुक्त किया गया है?
(च) यह कविता किस रस का है तथा अनुप्रास अलंकार सं
संबंधित पंक्तियाँ लिखिए।
प्रश्न-2. लघुतरीय प्रश्न
i)
श्रीकृष्ण द्वार योग संदेश भेजने पर
गोपियाँ क्या कहती हैं?
ii)
‘इक अति चतुर हुते पहलैं ही अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए’ में कौन-सा
व्यंग्य निहित है?
iii)
पहले के लोगों और अब लोगों में क्या
अन्तर किया गया है?
iv)
गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या
होना चाहिए?
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